नवरात्र कलश स्थापना पूजा विधि व मुहूर्त Kalash Sthapana Vrat Vidhi In Hindi

कैसे करें कलश स्थापना और पूजा विधि व शुभ मुहूर्त kalash sthapana in navratri worship method

हर साल में 2 बार नवरात्री आती हैं. पहले नवरात्रे चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरु होकर चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तक चलते है। अगले नवरात्रे  शारदीय नवरात्रे कहलाते है। ये नवरात्रे आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरु होकर नवमी तिथि तक रहते है।

नवरात्री में माँ के नौ रूपो का पूजन किया जाता है. यह हम आपको बताएंगे की नवरात्री में कलश स्थापना पूजा विधि व मुहूर्त क्या है.

साल 2017 में चैत्र नवरात्र 28 मार्च से शुरु होकर 5 अप्रैल तक रहेगें। इन नौ दिनों में माँ के नौ रूपो का पुरे विधि विधान से पूजन किया जायेगा. चैत्र नवरात्र में व्रत का संकल्प किया जाता है इसके बाद , मिट्टी की वेदी बनाकर ‘जौ बौया’ जाता है। इसी वेदी पर घट स्थापित किया जाता है। घट के ऊपर कुल देवी की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन “दुर्गा सप्तशती” का पाठ किया जाता है। पाठ पूजन के समय अखंड दीप जलाना चाहिए।

नवरात्री के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है. कलश स्थापना के लिए भी एक मुहूर्त होता है. साल 2017 में कलश स्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि (28 मार्च ) को प्रात: 08:26 बजे से 10:24 बजे तक है। इस समय के बीच ही घट स्थापना की जाएगी।

शास्त्रो में बताया गया है की किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा जरूर करनी चाहिए. माता जी की पूजा में कलश से संबन्धित एक मान्यता है के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है। इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है। कलश की स्थापना करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थान को गंगा जल से साफ किया जाता है. इसके बाद सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा रखी जाती है। और पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता है। इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बौये जाते है। जिन्हें दशमी की तिथि पर काटा जाता है। माता दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल के मध्य में स्थापित की जाती है।

कैसे करें कलश स्थापना

नवरात्र में कलश स्थापना के लिए सबसे पहले दिन स्नान कर पूजा स्थान को सुद्ध करना चाहिए. सीके बाए एक लकड़ी का पटटा लें और इस पर पर लाल रंग का वस्त्र बिछायें। इस कपडे में गणेश की प्रतिमा रखकर उनका स्मरण करें तथा थोड़े चावल रखें। इसके बाद एक मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर जौ बोयें, फिर इस पर जल से भरा मिट्टी, सोने या तांबे का कलश विधिवत स्थापित करें। कलश पर रोली से स्वास्तिक या ऊँ बनायें। कलश के मुख पर रक्षा सूत्र बाधे. बांधइसके बाद कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिये। अब कलश के मुख को ढक्कन से ढक कर इसे चावल से भर देना चाहिये। ण एक नारियल लें और उसमे एक चुनरी लपेटें और रक्षासूत्र से बांध दें। अब दीप जलाकर कलश की पूजा करें तथा सभी देवी-देवताओ का स्मरण करें. इस घट पर कुलदेवी की प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है। कलश की पूजा के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ करें.

कलश स्थापना के बाद के भगवान गणेश ओर माँ दुर्गा की पूजा आरती की जाती है तथा नौ दिनों तक मॉ के नौ रूपो का व्रत किया जाता है.